Tuesday, September 23, 2008

इक बार वक़्त से लम्हा गिरा कहीं ........


वक़्त जैसी अमूर्त चीज़ से लम्हा का गिरना हैरत की बात है। शेर ओ शायरी में अक्सर ऐसी शै नज़र आती हैं और हमें एक खुशनुमा अहसास से वाक़िफ़ करती हैं। लेकिन आखि़र ये बालाहै क्या? वक़्त कोई तरल तो है नही के लम्हा एक बूँद की तरह टपक जाए! वक़्त हमारे लिए जन्म से मृत्यु तक का अन्तराल है यानी वह हर पल जो जिया गया है और जो आगे जिया जायेगा इस लिहाज से तो लम्हा का गिरना ज़िंदगी का वह हिस्सा है जो जिया ही नही गया।



--- काली हवा


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